Monday, 16 November 2015

और दोस्त घर में सब खरियत तो है I कैसी खैरियत,यहाँ तो इस समय आफत ही आफत है  I समझ में नहीं आता कि मामला कैसे पटेI अरे कैसी आफत जरा हमभी तो सुने I

Saturday, 18 July 2015

महंगू और बचाऊ की नशे में  यो परिचर्चा चल ही  रही थी कि इतने में बचाऊ की औरत आई और सुर्ती की पुडिया व चुनौटी बचाऊ के पास रखकर चली गई I महंगू ने नशे में चढ़ी हुई आखो से भाभी को एक झलक देखा और फिर कुछ रूमानी अंदाज में बचाऊ से बोला Iभाभी में क्या  देख उसे ब्याह घर लाये I बचाऊ दोस्त को देख मुस्कराया  और  बोला I तुम्हारे भाभी के गाल का तिल मुझे बड़ा भाता था उसी पर रीझकर Iधत तेरीकी,इतनी छोटी चीज पर  रीझकर इतनी बड़ी जहमत ले आये I मुस्कराता हुआ महंगू बोला I दोनों हँसाने लगे I


बचाऊ गैर जातीय शादी को ले तथा उसके भावी परिणामो का ख्याल कर बड़े मानसिक तनाव से गुजर रहा था I ऐसे में आज जब बचाऊ का पुराना साथी हुक्का का कश लगाने के लिए उसके घर पंहुचा तो वह खुश हो गया क्योकि तनाव से मुक्ति के लिए  हुक्के का कश उसे जरुरी लग रहा था Iदेखा गया है की नशेबाजो में बड़ा प्रेम होता है जो नशा करते ही उमड़ पड़ता है .साथ में उनके ज्ञान का भंडार भी खुल जाता है .चूकी महगू बचाऊ के घर आया था इस कारण पहला कस मारने के लिए बचाऊ ने हुक्का महगू की तरफ बढ़ा दिया .
महगू-अरे भाई पहले आप ले .
बचाऊ -ये अनर्थ कैसे होगा आखिर आप मेरे मेहमान है .बिना आप को पिलाये मै कस कैसे लगा लू .न बाबा ना यह पाप होगा.
महगू-बड़ा जिद्दी है .ला अच्छा मुझे ही दे.हुक्का लेकर एक जोरदार  कस लगाया.ऐसा लगा जैसे अचानक वह सातवे आसमान की सैर करने पहुच गया हो.आखे  लाल लाल हो गयी चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान छा  गई .कश मारने के फौरन बाद  महगू ने हुक्का बचाऊ की तरफ कर दिया.
मानो कश लेने का मौन निमंत्रण देता हुआ यह कह रहा हो कि बेटे तू  भी भरपूर  कस ले ले और मेरी तरह  ब्रमहानन्द का मजा ले .
बचाऊ ने भी हुक्के का भरपूर कश लिया. अहा क्या बात  दो कश मारते ही दोनों के ज्ञान की बधी पोटली जैसे खुल कर बिखर गई . 

महगू -दोस्त विज्ञान बड़ा उन्नति कर गया लेकिन हमारा हुक्का ज्यो का त्यों ही रहा. 
बचाऊ -हमारे ऋषि मुनि जितना वैज्ञानिक उन्नति कर चुके थे उनके आगे आज का विज्ञान अभी बच्चा है .
महगू -चडूखाने की गप्प मारने में तुम्हारा कोई मुकाबला नही है दोस्त .बस किताबो में जो कहानी पढ़ ली उसे ही सच मान बैठे.
     बचाऊ  भी कम गहरे बाज न था.बोला-तो क्या तुम पुरानी बातो पर विस्वास नही करते?बचाऊ -यदि तुम्हारे विज्ञान की पहुच वहां तक न हो तो उन बातो को हम झुटला देगे?क्या मन्त्र तन्त्र झूठे है?
महगू-हमारा विज्ञान पुराने वैज्ञानिक खोजो से सहमत नही है.
तुम्हारा विज्ञान तो अपने पहुच के अनुसार बस हमारे पुराने खोजो को सत्यापित मात्र ही करता हैI बचाऊ बोलाI

Wednesday, 19 March 2014

भैया  किस समाज कि बात करते है? वही जो गरीबो का नही है।समाज भी ताकतवर का ही साथ देता हैं। यदि नेता मन्त्री,फ़िल्मी कलाकार या कोई धनवान आदमी गैर धर्म जाति मे विवाह कर ले तो वह महान है क्योकि उसने धर्म जाति की बेडी तोडी है्।किन्तु जब कोई गरीब एसा करे तो समाज मे थू थू।जहा समाज मे आदमी के लिये दो मापद्न्ड हो तो उस सडे समाज को छोड्ने मे ही भलाई है और बुद्धिमान यही करते भी है।रोटी,कपडा मकान हम अपनी मेहनत से जुटाते है समाज हमे मुफ़्त मे नही देता।फिर समाज की इतनी चिन्ता क्यो?कतवारु अपनी खुशी को निहारो और एसी लड्की घर मे लाओ जो घर मे अपने गुणो से आपके घर मे खुशिया ला सके।मै तुम्हारा इस नेक काम मे साथ दूगा।शादी करो या न करो क्योकि  वह तो उपर वाले की मर्जी से होती  है, लेकिन कहूगा कि एक बार अपने लडके की शादी करने के पहले बचाउ की लड्की को जरुर देख लेना। कतवारु को इस तरह के सलाह की आशा न थी। इस सलाह से वह अपने को किन्कर्तव्य विमूढ सा महसूस कर रहा था। ठीक है सोचूगा।कतवारु ने कहा।                                                                                                                             ट्राली ठीक होने के बाद कतवारु  उसे ले कर चल दिया।लेकिन शन्कर ने एक अजीब सी गुत्थी मे उसे डाल दिया था। आखिर आदमी सतरन्गी  भावनाओ व  विचारो का ही तो पुतला है् जिससे विश्व का सन्चालन होता है।  कतवारु के मन मे विचारो का घमासान युद्ध धम्म  धम्म  कर शुरु हो चुका था तथा यह स्पस्ट नही हो रहा था कि पुराने व नये विचार मे  कौन विजयी होगा।दो मे से कोई एक विचार को धराशाही होना है।                                                                                                               क्रमश:                                                                                          

Thursday, 13 March 2014

आखिर एक दिन आया और शन्कर तेली को लगा कि कतवारु से आज बात करने का अcछा मौका है। गर्मी की चिलचिलाती धूप मे कतवारु जो ट्राली पर छ्ड लादे जा राहा था अचानक ट्राली के पन्चर होने से उसे रुकना पड गया।                                                                                                                                                                   यो तो शायद बात न होती किन्तु बचाउ दोस्त काम सौप गया था इसलिये बात करनी जरुरी थी इसलिये--अरे कतवारु भैया बडी तेज धूप है हमारी दूकान मे आ जाओ छाह मिलेगी।शन्कर तेली ने आवाज दिया। शेठ्जी इस ट्राली को भी इसी समय पन्चर होना था शन्कर की दूकान मे पहुच कतवारु  ने कहा।                                     अरे बैठो पानी पियो और फिर अपनी समस्या को सुलझाओ।शन्कर तेली ने कहा।यहा तो पास मे कोइ पन्चर बनाने वाला भी नही है। पानी पीकर कतवारु बोला।शन्कर  ने कहा। बात तो सही है पर एक तरीका है वह यह कि मुझसे सलाई रिन्च हथौडा लेकर पन्चर पहिया खोल कर ले आओ  मेरा नौकर  साइकिल से जा मोहन  मिस्त्री से उसे बनवा लायेगा।                                                                                                                           शन्कर के इस प्रस्ताव से कतवारु खुश हो गया।स्वार्थ पूरा होने पर लोग खुश हो जाया ही करते ही है।जब नौकर पन्चर पहिया लेकर उसे बनवाने चला गया तो मौका पा धीरे से कतवारु से कहा। क्या बात है बचाउ धोबी आपके लडके को बहुत पसन्द करता है।कह रहा था कि इसके साथ अगर हमारी लडकी का व्याह हो जाय तो जोडा बडा अcछा लगता। अरे सेठ जी भला कैसी बात आप कर रहे है।भला ब्राम्ह्ण क्षत्री के घर धोबी की लडकी ब्याही जाती है।समाज हुक्का पानी बन्द कर देगा।                                                                                                                                                                                                                                       क्रमश: 

Saturday, 8 February 2014

शन्कर तेली के यहा से अपने घर लौट्ते वक्त बचाऊ ने देखा कि चौराहे पर भीड जमी है।पूछ्ने पर यह पता चला कि समाजवादी दल, भर जाति के लोगो का सम्मेलन करके उन्हे अपनी  सोई हस्ती का अहसास कर रहा है।बचाऊ सोचने लगा कि सच तो यह है कि  राजनीतिक पार्टी  के ये चालाक नेता अपने कुर्सी के स्वार्थ मे  भोली भाली ,दिमाग से कुन्द जनता को ठग बस अपना उल्लू ही सीधा करते है।अन्ग्रेजो ने हिन्दू मुसलमानो मे भेद पैदा कर भारत पर काफी वर्षो तक राज्य कर अपने देश के प्रति वफादारी का परिचय दिया।किन्तु हमारे नेताओ ने अपने देश के धर्मो के साथ अनेक जातियो मे भी अपने को अलग अलग मह्सूस करने का जहर भर दिया। अब ये राजनैतिक प्रेरणा से आपस मे लडते है, झगडते है और राजनीतिज्ञो के गुप्त कुर्सी स्वार्थ की पूर्ति करते है।यह रहा भारतीय नेताओ का देशप्रेम्।अपनी जातियता मे उलझा मनुष्य सन्कीर्ण मानसिकता का हो जाता है।किन्तु ज़ब गैर जाति मे सम्बन्ध होता है तो मानसिकता का विकास होने से दूसरी जाति भी बिल्कुल अपनी लगने लगती है और आपस मे वह एक मजबूत जुडाव की ओर अग्रसर होता है।
                                                        क्रमश:


Tuesday, 24 December 2013

बचाउ ज्यादा पढा तो न था लेकिन रोज अखवार पढने की आदत की वजह से उसे काफी सान्सारिक समझ हो गयी थी। गाँव के दूकान में चाय के कुल्हड़ पर खर्चा किये दो रूपये की पूरी कीमत देर तक अखवार पढके वसूलता था।शन्कर तेली भी उसका अcछा दोस्त था।जब कभी खाली होता तो उसके दूकान चला जाता और वहाँ बैठ इधर उधर की बाते कर समय गुजारता।दोनो मे खूब छनती थी।दोनो स्वभाव से एक जैसे।
    इतने मे कतवारु क्षत्री का लडका आकर बोला-“चाचा पचास ग्राम सरसो का तेल दे दो।"शन्कर ने पैसे ले उसकी छोटी शीशी मे तेल दे दिया।
      बचाउ ने गौर से उस लडके कि ओर देखा और शन्कर से उसके जाने पर पूछा-“क्या नाम है और किस क्लास मे लडका पढता है।" “मोहन और दसवे दर्जे मे पढता है।पढने मे अcछा है।काफी गरीबी मे पल रहा है। बाप मेहनत मजदूरी करता है।"बता, शन्कर दूस्ररे ग्राहक को निबटाने मे मगन हो गया।
बचाउ सोचने लगा कि यदि इसका,हमारी लडकी से जोडा बन जाये तो कितना अcछा होता? हमारी लडकी सुन्दर है और यह क्षत्री लडका बहुत गरीब लेकिन होनहार लगता है।अगर इसके यहाँ  रिश्ता तय हो जाता है तो हमारी पहुच अगाडी जाति मे हो जायेगी और धीरे धीरे हम भी अगाडी जाति मे बदल जायेगे।सरकार तो बस जातिगत मुद्दा उठा कर अपने कुर्सी लाभ के लिये खेल खेलती है और छोटी जाति वाले उसके इस शातिर राजनैतिक खेल के मुहरे मात्र ही होते है।क्या जातीय विभिन्नता अमीरी गरीबी मे बाँध कर नही देखना चाहिये, देशभक्ति का तो यही सही चिन्तन  है।
       शन्कर जब ग्राहको से खाली हुआ तो हाथ मे लगा तेल पोछ्ते हुये बचाउ से कहा-“कतवारु के लडके के लिये क्यो पूछा क्या कोई बदमासी उसने की है”?
“ना भैया।यह लडका हमे अपनी लडकी के लिये भा गया है।लेकिन जाति का मेल नही है। आपने हमारी लडकी तो देखी ही है।कितनी सुन्दर व सुघड है।बात करो शायद  शादी का मामला बैठ जाय।"बचाउ बोला।
“और अगर भडक गया तो”?शन्कर ने प्रश्नवाचक मुद्रा मे पूछा।
“अरे थोडी भूमिका बना कर बात करना।कोई धनवान क्षत्री उसे अपनी रुपवती कन्या थोडे ही देगा। नही रुचि लेगा तो कह देना यो ही मजाक कर रहा था।" धन के मामले मे मै उससे बीस ही हूँ।  बचाउ ने कहा।           "हूँ"।शन्कर ने सर हिलाया।


                                                 क्रमश:---

Monday, 16 December 2013

इधर बचाउ भी कुछ दिनो से मानसिक उदासी के दौर से गुजर रहा था।कारण उसे कोई अतिरिक्त कार्य नही मिल पा रहा था ताकि उसके आय मे इजाफ़ा हो।इसी उधेड बुन मे वह मगजमारी कर ही रहा था कि सहसा पडोस के पंडितजी आये और बताया कि “उनके लडकी की शादी चार दिन बाद शुक्रवार को होगी तथा उसमे कपडा प्रेस करने के लिये जनमासे मे उसे टेबुल लगाना होगा।बताया कि पूरे एक हजार रुपये, एक जोडी कपडा के साथ मुफ़्त का अcछा खाना पीना भी उस दिन देगे। किन्तु झूठे ना नुकुर के बाद अन्तत: बचाउ इसके लिये राजी हो गया।उसके राजी होने पर दो सैकडा रुपये का  बयाना उसे देकर, मन मे उसे कोसते हुये”कितना भी दे दो इन बेइमानो को लेकिन खुश नही होते।”

पंडितजी बाहर निकल गये।पंडितजी की अपनी गरज थी।बचाउ जिसका इन्तजार कर रहा था वह उसे घर बैठे मिल गया।खुश हो चुटकी भर सुर्ती को मुह मे दबा, मुल्ला फ़सा कहते हुये पंडितजी के निकलने के बाद वह भी कही बाहर निकल गया। हर कोई का अपना दायरा होता है और उसके मुताबिक मिलने पर वह खुश हो जाता है।