Tuesday, 24 December 2013

बचाउ ज्यादा पढा तो न था लेकिन रोज अखवार पढने की आदत की वजह से उसे काफी सान्सारिक समझ हो गयी थी। गाँव के दूकान में चाय के कुल्हड़ पर खर्चा किये दो रूपये की पूरी कीमत देर तक अखवार पढके वसूलता था।शन्कर तेली भी उसका अcछा दोस्त था।जब कभी खाली होता तो उसके दूकान चला जाता और वहाँ बैठ इधर उधर की बाते कर समय गुजारता।दोनो मे खूब छनती थी।दोनो स्वभाव से एक जैसे।
    इतने मे कतवारु क्षत्री का लडका आकर बोला-“चाचा पचास ग्राम सरसो का तेल दे दो।"शन्कर ने पैसे ले उसकी छोटी शीशी मे तेल दे दिया।
      बचाउ ने गौर से उस लडके कि ओर देखा और शन्कर से उसके जाने पर पूछा-“क्या नाम है और किस क्लास मे लडका पढता है।" “मोहन और दसवे दर्जे मे पढता है।पढने मे अcछा है।काफी गरीबी मे पल रहा है। बाप मेहनत मजदूरी करता है।"बता, शन्कर दूस्ररे ग्राहक को निबटाने मे मगन हो गया।
बचाउ सोचने लगा कि यदि इसका,हमारी लडकी से जोडा बन जाये तो कितना अcछा होता? हमारी लडकी सुन्दर है और यह क्षत्री लडका बहुत गरीब लेकिन होनहार लगता है।अगर इसके यहाँ  रिश्ता तय हो जाता है तो हमारी पहुच अगाडी जाति मे हो जायेगी और धीरे धीरे हम भी अगाडी जाति मे बदल जायेगे।सरकार तो बस जातिगत मुद्दा उठा कर अपने कुर्सी लाभ के लिये खेल खेलती है और छोटी जाति वाले उसके इस शातिर राजनैतिक खेल के मुहरे मात्र ही होते है।क्या जातीय विभिन्नता अमीरी गरीबी मे बाँध कर नही देखना चाहिये, देशभक्ति का तो यही सही चिन्तन  है।
       शन्कर जब ग्राहको से खाली हुआ तो हाथ मे लगा तेल पोछ्ते हुये बचाउ से कहा-“कतवारु के लडके के लिये क्यो पूछा क्या कोई बदमासी उसने की है”?
“ना भैया।यह लडका हमे अपनी लडकी के लिये भा गया है।लेकिन जाति का मेल नही है। आपने हमारी लडकी तो देखी ही है।कितनी सुन्दर व सुघड है।बात करो शायद  शादी का मामला बैठ जाय।"बचाउ बोला।
“और अगर भडक गया तो”?शन्कर ने प्रश्नवाचक मुद्रा मे पूछा।
“अरे थोडी भूमिका बना कर बात करना।कोई धनवान क्षत्री उसे अपनी रुपवती कन्या थोडे ही देगा। नही रुचि लेगा तो कह देना यो ही मजाक कर रहा था।" धन के मामले मे मै उससे बीस ही हूँ।  बचाउ ने कहा।           "हूँ"।शन्कर ने सर हिलाया।


                                                 क्रमश:---

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