Friday, 15 November 2013

बचाऊ की पत्नी खुले हाथ से खर्च करना चाहती जबकि बचाऊ कोई ब्यय झटके से न करता .ब्यय करने के पूर्व वह यह चिंतन जरुर करता कि क्या इस ब्यय के बगैर भी उसका काम चल जायेगा यदि हा तो वह खर्चा टाल जाता.इसके विपरीत पत्नी के मन में किसी जरूरत पूरा करने की तरंग उठती और उसके पास यदि पैसा है तो वह उसे अवश्य पूरा करती जिसे बचाऊ पसंद न करता...और दोनों की विपरीत अभिब्यक्ति यही से शुरु हो कर तू तू मै मै तक पहुच जाती.
   बचाऊ बीते दिनों के ख्वाब में खोया था .सोच रहा था कि जब पहली बार वह उसे  देखने गया तो उसके रुप के लालित्य व कमनीयता में उसे अजीब सी माद्कता का अनुभव हुआ था तथा वहा उसके काम के सलीके को देख उसका  मन गुदगुदा उठा था,और इसी से प्रेरित हो उसने ब्याह का प्रस्ताव रखा था जिसे उसके पिता श्री ने स्वीकार कर गंगा स्नान किया था.

     लेकिन थोड़े ही दिन में उसकी बनावटी मृदुता , जेठ की तीखी धूप में बदल गई.अब उसे भोलेभाले चेहरे के भीतर बैठा एक  शैतान दिखाई दे रहा है. लगता फूल जैसे अपने चारो तरफ काटे ही काटे समेटे हुए है और जिसकी चुभन उसे साल रही है. समय के साथ जीवन परिदृश्य तेजी से बदल रहा है.जीवन साथी का सानिद्य अब अन्तकरण मे मिठास सृजित नही कर पा रहा है. दोनों एक दुसरे से आशाओं पर खरे नही उतर रहे है. पीहर से बधी रस्सी किसी तरह ढीली होने का नाम न लेती. उसे लगा वह उसकी सहयोगी न बन प्रतिद्वंदी बन रही है. इस माहौल में वह  तिलतिल कर मर रहा है . बात बात पर कलह करना तथा कुतर्को से उसके तर्को को ध्वस्त करना और मौका देख भीतरघात करना उसका स्वभाव बन चूका है.माहौल अक्सर कई कई दिन तक गमगीन रहता.बाहर के लोगो से निपटाना आसन है किन्तु घर के  कलह से  निपटाना बड़ा मुश्किल है. उसकी प्यारी मनमानी कर उसे हासिये में डाल चुकी है.उसे अनुभव हो रहा था जैसे कोई प्रिय उसके गोद में बैठ उसके दाढी के एक एक बाल नोच नोच कर क्रमशः उसे दंस दे रहा हो.अब वह उसे खुरापात का खजाना लगने लगी थी.
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Tuesday, 5 November 2013

बचाऊ से उसकी पत्नी और बच्चों की अक्सर अनबन रहती है जो सकारण है.वे उसे बड़ा कंजूस कहते.जबकि बचाऊ अपने को कंजूस नही विवेकपूर्ण मानता तथा परिवार के लोगो को वह फिजूल खर्च करने वाला कहता.मसलन घर में रोग की स्थित में पहले वह घरेलु इलाज,फेल होने पर होम्योपैथिक  तथा फेल होने पर आयुवेदिक,एलोपथिक इलाज करता है.घरवाले चाहते है कि वह सीधे उन्हे अच्छ अंग्रेजी डाक्टर के पास ले जाये. किन्तु इसे वह धन की बर्बादी मानता है क्योकि जब घरेलु इलाज से ही काम बन जाये तो वह बड़े डाक्टर का इलाज़ कर अधिक फीस व उसके लिये दूर आने जाने में धन क्यो बर्बाद करे.लेकिन उसके गाढ़ी कमाई के पैसे बर्बाद करवाने में परिवारिक जन संकोच न करते जिससे उसका मन बड़ा दुखित होता.किन्तु पारिवारिक सुख शांति के लिये उनके कई विवेकहीन बातो पर वह भारी मन से समझौता कर लेता और धीमे से रामायण की यह चौपाइ ‘भइ गति साप छछूदर केरी’ बुदबुदा उठता.


Monday, 4 November 2013

 कहानी---- 

बचाऊ धोबी 
गाँव का एक धोबी बचाऊ .बड़ा कंजूस व जुगाडू .दो दो शादिया की.एक औरत तीन औलाद छोडकर मर गई व दूसरी तीन औलाद के साथ बचाऊ के जीवन की कहानी आगे लिखने में सहयोग कर रही है.
  देखने में भला चंगा बचाऊ के जीने का अंदाज निराला है .रोज घर में शोर कर सबेरे कपडे के गठठर के साथ घाट जाना उसकी मज़बूरी है. कभी कभी जब वह  मस्ती में होता तो धोबिया शैली का गाना गाने से भी न चूकता.  
   जवान होते ही वह अपने पुस्तैनी पेशे में लग गया.कपड़ा धोना प्रेस करना उसे कायदे से रखना तथा कपड़ो को ग्राहकों को देना लेना उसका रोज का काम है.पुस्तैनी पेशा होने से इस काम के लिये उसे बाज़ार बनाने की कोई जरुरत भी न हुई.
  सादा जीवन उच्च विचार के तहत वह सादा जीवन जीता ही जा रहा है. किन्तु विचार उसके कितने ऊचे है यह तय  करना हम आप पर छोड़ते है. दूसरो से मिले पुराने कपड़ो को साफ सुथरे ढंग से पहनना खुद द्वारा सिलाये गए कपडे को विशेष अवसर में पहनने के लिये निकलना यह उसकी आदत है.  
बचाऊ अपने पुस्तैनी काम के अलावा आमदनी बढiने के लिये कुछ दुसरे छोटे मोटे काम भी करता है. मसलन आज सुबह तडके मेरे घर पहुच उसने मुझे आवाज दिया –“बाबूजी घर के बाहर दरवाजे पर उगी घास साफ कर दिया है, देख लेवे वरना कहेगे एक छोटा सा कiम दिया वो भी नहीं किया”. सोचा एहसान के साथ काम का पूरा पैसा भी वसूलता है मक्कार कही का .

“अरे ठीक है उसे देखना क्या”.कहते हुए मैं अन्दर आ गया. मैने सोचा कि इतने सबेरे क्या दू बाद में कुछ दे दूंगा. किन्तु ढीठ सा खड़ा वह मेरे कुछ देने का इंतजार करता रहा.पांच मिनट के बाद उसने फिर पुकारा “बाबूजी तो फिर मै चलू”.”नहीं नहीं रुको मै आ रहा हूँ”. कहता हुआ जाकर मैंने दस रुपये का नोट उसके हाथ पर रख दिये.मैं जानता था कि बगैर कुछ लिए वह टसकने वाला नहीं है. नोट लेकर एक सेकेण्ड उसे  खोलता मोड़ता रहा मानो कि मूक रुप से हमें चेता रहा हो की भुगतान कुछ कम है ,बाबूजी आगे भुगतान बढ़ाने के लिये कुछ कीजिये वरना काम होना मुश्किल है."अच्छi हम चलते है" कहकर वह आगे बढ़ गया. बचाऊ बड़ा ईमानदार व हिसाब का पक्का है इसमे दो राय नहीं .सारा का सारा गाँव एक बचाऊ को छोडकर बेइमानी से मुफ्त की बिजली जलाता है लेकिन वही है जो कनेक्शन लेने के पहले वर्सो तक मिट्टी का तेल खरीद उससे ढेबरी जला घर रौशन किया करता था.वह मितव्ययिता से बिजली खर्चा कर उतना  घर रौशन नहीं कर पता था जितना कि गाँव के बिजली चोर अपने घर को रौशन कर लेते थे. उसकी पत्नी भी उसके इमानदारी से चिढती है.आप खाली इमानदारी से अपने पत्नी को खुश नहीं कर सकते उसके लिये कुछ जोखिम उठानी पड़ेगी.  गाँव के लोग उसे मूर्ख कहते.   
                                                 क्रमशः