इधर बचाउ भी कुछ दिनो से मानसिक उदासी के दौर से गुजर रहा
था।कारण उसे कोई अतिरिक्त कार्य नही मिल पा रहा था ताकि उसके आय मे इजाफ़ा हो।इसी
उधेड बुन मे वह मगजमारी कर ही रहा था कि सहसा पडोस के पंडितजी आये और बताया कि “उनके लडकी की शादी चार दिन बाद शुक्रवार को होगी तथा उसमे कपडा प्रेस करने के लिये जनमासे मे उसे टेबुल लगाना होगा।बताया कि पूरे एक हजार रुपये, एक जोडी कपडा के साथ मुफ़्त का अcछा खाना पीना भी उस दिन देगे। किन्तु झूठे
ना नुकुर के बाद अन्तत: बचाउ इसके लिये राजी हो गया।उसके राजी होने पर दो सैकडा रुपये का बयाना उसे देकर, मन मे उसे कोसते हुये”कितना भी दे दो इन बेइमानो को लेकिन खुश नही होते।”
पंडितजी बाहर निकल गये।पंडितजी की अपनी गरज थी।बचाउ जिसका इन्तजार कर रहा था वह उसे घर बैठे मिल गया।खुश हो चुटकी भर सुर्ती को मुह मे दबा, मुल्ला फ़सा कहते हुये पंडितजी के निकलने के बाद वह भी कही बाहर निकल
गया। हर कोई का अपना दायरा होता है और उसके मुताबिक मिलने पर वह खुश हो जाता है।
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