बचाऊ से उसकी पत्नी और बच्चों की अक्सर अनबन रहती है जो
सकारण है.वे उसे बड़ा कंजूस कहते.जबकि बचाऊ अपने को कंजूस नही विवेकपूर्ण मानता तथा परिवार के लोगो को वह फिजूल खर्च करने वाला कहता.मसलन घर
में रोग की स्थित में पहले वह घरेलु इलाज,फेल होने पर होम्योपैथिक तथा फेल होने पर आयुवेदिक,एलोपथिक इलाज करता है.घरवाले
चाहते है कि वह सीधे उन्हे अच्छ अंग्रेजी डाक्टर के पास ले जाये. किन्तु इसे वह धन की बर्बादी मानता है क्योकि जब घरेलु इलाज से ही काम बन जाये तो वह बड़े डाक्टर का इलाज़ कर अधिक फीस
व उसके लिये दूर आने जाने में धन क्यो बर्बाद करे.लेकिन उसके गाढ़ी कमाई के पैसे बर्बाद करवाने
में परिवारिक जन संकोच न करते जिससे उसका मन बड़ा दुखित होता.किन्तु पारिवारिक सुख
शांति के लिये उनके कई विवेकहीन बातो पर वह भारी मन से समझौता कर लेता और धीमे से रामायण
की यह चौपाइ ‘भइ गति साप छछूदर केरी’ बुदबुदा उठता.
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